श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 150: श्रीहनुमान‍्जीके द्वारा भीमसेनको अपने विशाल रूपका प्रदर्शन और चारों वर्णोंके धर्मोंका प्रतिपादन  »  श्लोक 51-52
 
 
श्लोक  3.150.51-52 
तपोधर्मदमेज्याभिर्विप्रा यान्ति यथा दिवम्।
दानातिथ्यक्रियाधर्मैर्यान्ति वैश्याश्च सद्‍गतिम्॥ ५१॥
क्षत्रं याति तथा स्वर्गं भुवि निग्रहपालनै:।
सम्यक् प्रणीतदण्डा हि कामद्वेषविवर्जिता:।
अलुब्धा विगतक्रोधा: सतां यान्ति सलोकताम्॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
जैसे ब्राह्मण तप, धर्म, इन्द्रिय संयम और यज्ञादि कर्मों द्वारा उत्तम लोक को जाते हैं और जैसे वैश्य दान और आतिथ्य के गुणों द्वारा उत्तम गति को प्राप्त होते हैं, वैसे ही क्षत्रिय इस लोक में संयम और अनुग्रह का समुचित प्रयोग करके स्वर्ग को जाते हैं। जिनके द्वारा दण्डनीति का समुचित प्रयोग किया जाता है, जो राग-द्वेष से रहित, लोभ और क्रोध से रहित हैं; वे क्षत्रिय उत्तम पुरुषों को प्राप्त होने वाले लोकों को प्राप्त होते हैं।
 
Just as Brahmins go to the best world through austerity, religion, control of senses and rituals of sacrifice and just as Vaishya achieves good progress through the virtues of charity and hospitality, in the same way a Kshatriya goes to heaven by proper use of self-control and grace in this world. Those by whom the policy of punishment is used properly, who are free from attachment and hatred, without greed and without anger; Those Kshatriyas go to the worlds attained by good men.
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां हनुमद्भीमसेनसंवादे पञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १५०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें हनुमान‍्जी और भीमसेनका संवादविषयक एक सौ पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १५०॥

 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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