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mahabharat 3.149.15: उस युग में कोई रोग नहीं था। इन्द्रियों में कोई दुर्बलता नहीं थी। किसी के गुणों में कोई दोष नहीं देखता था। किसी को दुःख के कारण रोना नहीं पड़ता था, किसी को अभिमान नहीं था; और कोई विकार नहीं था॥15॥   |   mahabharat अध्याय 3.149: हनुमान‍्जीके द्वारा चारों युगोंके धर्मोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 149: हनुमान‍्जीके द्वारा चारों युगोंके धर्मोंका वर्णन  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  3.149.15 
न तस्मिन् युगसंसर्गे व्याधयो नेन्द्रियक्षय:।
नासूया नापि रुदितं न दर्पो नापि वैकृतम्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
उस युग में कोई रोग नहीं था। इन्द्रियों में कोई दुर्बलता नहीं थी। किसी के गुणों में कोई दोष नहीं देखता था। किसी को दुःख के कारण रोना नहीं पड़ता था, किसी को अभिमान नहीं था; और कोई विकार नहीं था॥15॥
 
There was no illness in that era. There was no weakness in the senses. No one found fault in anyone's qualities. No one had to cry due to sorrow and no one was proud; and there was no other disorder.॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)