स्वागतं सर्वथैवेह तवाद्य मनुजर्षभ।
इमान्यमृतकल्पानि मूलानि च फलानि च॥ ९५॥
भक्षयित्वा निवर्तस्व मा वृथा प्राप्स्यसे वधम्।
ग्राह्यं यदि वचो मह्यं हितं मनुजपुङ्गव॥ ९६॥
अनुवाद
हे महापुरुष! आज यहाँ आपका हर प्रकार से स्वागत है। इन अमृत के समान मीठे फल-मूल खाकर फिर यहाँ से लौट जाइए, अन्यथा आपका जीवन व्यर्थ ही संकट में पड़ जाएगा। हे महापुरुष! यदि मेरी बातें लाभदायक प्रतीत हों, तो इनका पालन अवश्य कीजिए। 95-96।
O great man! Today you are welcome here in every way. Eat these sweet fruits and roots like nectar and then return from here, otherwise your life will be in danger in vain. O great man! If my words seem beneficial, then do follow them. 95-96.
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां भीमकदलीषण्डप्रवेशे षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १४६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें भीमसेनका कदलीवनमें प्रवेशविषयक एक सौ छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १४६॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥