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श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 146: भीमसेनका सौगन्धिक कमल लानेके लिये जाना और कदलीवनमें उनकी हनुमान‍्जीसे भेंट  »  श्लोक 18-20
 
 
श्लोक  3.146.18-20 
आजिघ्रन् स महातेजा: सर्वर्तुकुसुमोद्भवम्॥ १८॥
गन्धमुद्धतमुद्दामो वने मत्त इव द्विप:।
वीज्यमान: सुपुण्येन नानाकुसुमगन्धिना॥ १९॥
पितु: संस्पर्शशीतेन गन्धमादनवायुना।
ह्रियमाणश्रम: पित्रा सम्प्रहृष्टतनूरुह:॥ २०॥
 
 
अनुवाद
महाबली कुंतीपुत्र सभी ऋतुओं के पुष्पों की तीव्र सुगंध का आनंद लेते हुए, आनंद से मदमस्त जंगली हाथी की तरह वन में विचरण कर रहे थे। नाना प्रकार के पुष्पों से सुगन्धित, गंधमादन की अत्यंत शुद्ध वायु उन्हें पंखा झल रही थी। जिस प्रकार एक पिता को अपने पुत्र का स्पर्श शीतल एवं सुखद लगता है, उसी प्रकार भीमसेन को उस पर्वतीय वायु के स्पर्श से वैसा ही आनंद मिल रहा था। उनके पिता, वायुदेव, उनकी सारी थकान दूर कर रहे थे। उस समय भीम का शरीर अत्यधिक आनंद से पुलकित हो रहा था।
 
The mighty son of Kunti was moving about in the forest like a wild elephant intoxicated with ecstasy, enjoying the intense fragrance of flowers of all seasons. The extremely pure air of Gandhamadan, fragrant with various kinds of flowers, was fanning him. Just as a father finds the touch of his son cool and pleasant, Bhimasena was getting the same pleasure from the touch of that mountain air. His father, the wind god, was taking away all his tiredness. At that time, Bhima's body was thrilled with extreme joy. 18-20.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)