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mahabharat 3.143.12: वायु के झोंकों से मोहित होकर वे सब लोग सोचने लगे कि क्या आकाश फट गया है, क्या पृथ्वी फट गई है, क्या कोई पर्वत फट गया है॥12॥   |   mahabharat अध्याय 3.143: गन्धमादनकी यात्राके समय पाण्डवोंका आँधी-पानीसे सामना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 143: गन्धमादनकी यात्राके समय पाण्डवोंका आँधी-पानीसे सामना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  3.143.12 
द्यौ: स्वित् पतति किं भूमिर्दीर्यते पर्वतो नु किम्।
इति ते मेनिरे सर्वे पवनेनापि मोहिता:॥ १२॥
 
 
अनुवाद
वायु के झोंकों से मोहित होकर वे सब लोग सोचने लगे कि क्या आकाश फट गया है, क्या पृथ्वी फट गई है, क्या कोई पर्वत फट गया है॥12॥
 
Fascinated by the gusts of wind, all of them began to wonder whether the sky had burst open, whether the earth was being torn apart, or whether a mountain was being split.॥12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)