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श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 142: पाण्डवोंद्वारा गंगाजीकी वन्दना, लोमशजीका नरकासुरके वध और भगवान् वाराहद्वारा वसुधाके उद्धारकी कथा कहना  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  3.142.46 
रक्ताभ्यां नयनाभ्यां तु भयमुत्पादयन्निव।
धूमं च ज्वलयँल्लक्ष्म्या तत्र देशे व्यवर्धत॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
वह अपनी लाल-लाल आँखों से भय उत्पन्न करता हुआ प्रतीत हो रहा था और अपने शरीर की कांति से गूँज पैदा करता हुआ उस स्थान की ओर बढ़ने लगा ॥46॥
 
He seemed to be creating fear with his red eyes and started moving towards that place creating a buzz with the radiance of his body. ॥ 46॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)