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mahabharat 3.138.18-19h: वहाँ जाकर उसने भगवान सूर्य की शरण ली और घोर तपस्या करके उस ब्राह्मणमुख वाले पुरुष ने सूर्यसम्बन्धी रहस्यमय वेदमंत्र का उच्चारण किया। तत्पश्चात सर्वभक्षी एवं अविनाशी भगवान सूर्य ने साकार रूप धारण करके अर्वावसु को दर्शन दिए। 18 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 3.138: अर्वावसुकी तपस्याके प्रभावसे परावसुका ब्रह्महत्यासे मुक्त होना और रैभ्य,भरद्वाज तथा यवक्रीत आदिका पुनर्जीवित होना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 138: अर्वावसुकी तपस्याके प्रभावसे परावसुका ब्रह्महत्यासे मुक्त होना और रैभ्य,भरद्वाज तथा यवक्रीत आदिका पुनर्जीवित होना  »  श्लोक 18-19h
 
 
श्लोक  3.138.18-19h 
उग्रं तप: समास्थाय दिवाकरमथाश्रित:।
रहस्यवेदं कृतवान् सूर्यस्य द्विजसत्तम:॥ १८॥
मूर्तिमांस्तं ददर्शाथ स्वयमग्रभुगव्यय:।
 
 
अनुवाद
वहाँ जाकर उसने भगवान सूर्य की शरण ली और घोर तपस्या करके उस ब्राह्मणमुख वाले पुरुष ने सूर्यसम्बन्धी रहस्यमय वेदमंत्र का उच्चारण किया। तत्पश्चात सर्वभक्षी एवं अविनाशी भगवान सूर्य ने साकार रूप धारण करके अर्वावसु को दर्शन दिए। 18 1/2॥
 
Going there, he took refuge in Lord Surya and after performing severe penance, that Brahmin-headed man performed the mysterious Vedic mantra related to Surya. Thereafter, the omnivorous and indestructible Lord Surya appeared in physical form and gave darshan to Arvavasu. 18 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)