अध्याय 138: अर्वावसुकी तपस्याके प्रभावसे परावसुका ब्रह्महत्यासे मुक्त होना और रैभ्य,भरद्वाज तथा यवक्रीत आदिका पुनर्जीवित होना
श्लोक 1: लोमशजी कहते हैं - युधिष्ठिर! इन्हीं दिनों में परम सौभाग्यशाली एवं प्रतापी राजा बृहद्द्युम्न ने यज्ञ का अनुष्ठान आरम्भ किया। वे रैभ्य के यजमान थे।
श्लोक 2: बुद्धिमान बृहद्द्युम्न ने यज्ञ के लिए रैभ्य के दोनों पुत्रों अर्वावसु और परावसु को अपना सहयोगी बनाया ॥2॥
श्लोक 3-4: कुंतीपुत्र! पिता की आज्ञा पाकर दोनों भाई राजा के यज्ञ में सम्मिलित होने चले गए। आश्रम में केवल ऋषि रैभ्य और उनके पुत्र परावसु की पत्नी ही रह गए। एक दिन परावसु गृहस्थी संभालने के लिए अकेले आश्रम आए। उस समय उन्होंने वन में अपने पिता को काले मृगचर्म से ढके हुए देखा। 3-4.
श्लोक 5: रात्रि का अन्तिम भाग बीत रहा था और अभी भी अँधेरा था। परावसु नींद के कारण अंधा हो रहा था; इसलिए उसने अपने पिता को घने जंगल में विचरण करने वाले किसी हिंसक पशु के रूप में देखा।
श्लोक 6: और उसने अपने पिता को जंगली जानवर समझकर धोखे से मार डाला। हालाँकि वह ऐसा नहीं करना चाहता था, फिर भी उसने जंगली जानवर से अपने शरीर की रक्षा के लिए यह क्रूर कार्य किया।
श्लोक 7-9: अपने पिता के अंतिम संस्कार की सारी विधियाँ संपन्न करके वह पुनः यज्ञ मण्डप में आया और अपने भाई अर्वासु से बोला - 'भैया! तुम अकेले उस यज्ञ को किसी भी प्रकार से सम्पन्न नहीं कर सकते। मैंने अपने पिता को जंगली पशु समझकर छल से मार डाला है; अतः हे भाई! तुम ब्राह्मण-हत्या रोकने के लिए मेरे लिए व्रत करो और मैं राजा का यज्ञ सम्पन्न करूँगा। मुनि! मैं यह कार्य अकेले भी करने में समर्थ हूँ।'
श्लोक 10: अर्वावसु ने कहा - भाई! तुम परम बुद्धिमान राजा बृहद्द्युम्न का यज्ञ करो और मैं इन्द्रियों को वश में करके तुम्हारे लिए ब्रह्म हत्या का प्रायश्चित करूँगा।
श्लोक 11-13: लोमशजी कहते हैं- युधिष्ठिर! अर्वावसु मुनि अपने भाई की ब्रह्महत्या का प्रायश्चित पूर्ण करके उस यज्ञ में पुनः आये। अपने भाई को वहाँ उपस्थित देखकर अर्वावसु ने हर्षित वाणी में राजा बृहद्द्युम्न से कहा- 'हे राजन! यह ब्रह्महत्या है। अतः उसे आपके यज्ञ को देखने के लिए इस मण्डप में प्रवेश नहीं करना चाहिए। ब्रह्महत्यादि पुरुष अपनी दृष्टि मात्र से ही आपको महान संकट में डाल सकता है, इसमें संशय नहीं है। 11-13॥
श्लोक 14-15: लोमश कहते हैं - प्रजानाथ! परावसुकि की यह बात सुनकर राजा ने अपने सेवकों को आदेश दिया कि अरववसु को भीतर न आने दिया जाए। हे राजन! उस समय जब अरववसु को सेवकों ने बाहर निकाला, तो वह बार-बार यही कहता रहा कि उसने ब्रह्महत्या नहीं की है। हे भारत! तब भी राजा के सेवक उसे ब्रह्महत्यारा कहकर संबोधित करते थे।
श्लोक 16: अर्वावसु ने यह स्वीकार नहीं किया कि उसने ब्राह्मण-हत्या की है। उसने बार-बार यह कहने का प्रयत्न किया कि 'मेरे भाई ने ब्राह्मण-हत्या की थी। मैंने उसका प्रायश्चित करके उसे पाप से मुक्त कर दिया है।'॥16॥
श्लोक 17: उसके इतना कहने पर भी राजा के सेवकों ने क्रोधपूर्वक उसे डाँटा। तब वह महातपस्वी ऋषि चुपचाप वन में चले गए।
श्लोक 18-19h: वहाँ जाकर उसने भगवान सूर्य की शरण ली और घोर तपस्या करके उस ब्राह्मणमुख वाले पुरुष ने सूर्यसम्बन्धी रहस्यमय वेदमंत्र का उच्चारण किया। तत्पश्चात सर्वभक्षी एवं अविनाशी भगवान सूर्य ने साकार रूप धारण करके अर्वावसु को दर्शन दिए। 18 1/2॥
श्लोक 19-20: लोमशजी कहते हैं- राजन! अर्वावसु के उस कर्म से सूर्य आदि सभी देवता उस पर प्रसन्न हो गए। उन्होंने अर्वावसुका यज्ञ में वरण करके परावसु को निकाल दिया। तत्पश्चात् अग्नि, सूर्य आदि देवताओं ने उससे वर देने की इच्छा व्यक्त की। 19-20॥
श्लोक 21: तब अर्वावसु ने यह वरदान माँगा कि 'मेरे पिता पुनः जीवित हो जाएँ। मेरे भाई निर्दोष हों और अपने पिता की हत्या को भूल जाएँ।'
श्लोक 22: साथ ही उन्होंने यह भी माँग की कि ‘भारद्वाज और यवक्रीत दोनों को पुनर्जीवित किया जाए तथा सूर्यदेवता से संबंधित इस रहस्यमय वेदमन्त्र की स्थापना की जाए।’ जब द्विजश्रेष्ठ अर्वावसु ने इस प्रकार वर माँगा, तो देवताओं ने कहा - ‘ऐसा ही हो।’ इस प्रकार उन्होंने पूर्वोक्त सभी वर प्रदान कर दिए॥22॥
श्लोक 23-25h: युधिष्ठिर! इसके बाद उपर्युक्त सभी ऋषिगण जीवित हो गए। उस समय यवक्रीत ने अग्नि सहित सभी देवताओं से पूछा - 'हे देवताओं! मैंने वेदों का अध्ययन किया है, वैदिक व्रतों का भी अनुष्ठान किया है। मैं स्वाध्यायी और तपस्वी भी हूँ, फिर भी रैभ्य मुनि मुझे इस प्रकार अनुचित रीति से कैसे मार सके?'॥23-24 1/2॥
श्लोक 25-26: देवताओं ने कहा, "मुनि यवक्रीत! आप अपनी बात को ज्यों का त्यों न लें। पूर्वकाल में आपने बिना गुरु के ही सुखपूर्वक समस्त वेदों को पढ़ लिया है और इन रैभ्य ऋषि ने बहुत कष्ट सहकर अपने आचरण से गुरुजनों को संतुष्ट किया तथा दीर्घकाल तक कष्ट सहन करके उत्तम वेदों का ज्ञान प्राप्त किया।"
श्लोक 27: लोमश कहते हैं: हे राजन! यवक्रीत से ऐसा कहकर अग्नि आदि देवताओं ने उन सबको नया जीवन दिया और फिर स्वर्गलोक को चले गये।
श्लोक 28: हे राजनश्रेष्ठ! यह उन्हीं रैभ्य मुनि का पवित्र आश्रम है। यहाँ के वृक्ष सदैव पुष्पों और फलों से लदे रहते हैं। यहाँ एक रात्रि निवास करने से तुम अपने समस्त पापों से मुक्त हो जाओगे। 28.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥