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श्री महाभारत
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पर्व 3: वन पर्व
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अध्याय 136: यवक्रीतका रैभ्यमुनिकी पुत्रवधूके साथ व्यभिचार और रैभ्यमुनिके क्रोधसे उत्पन्न राक्षसके द्वारा उसकी मृत्यु
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श्लोक 8
श्लोक
3.136.8
शृण्वानस्यैव रैभ्यस्य यवक्रीत विचेष्टितम्।
दहन्निव तदा चेत: क्रोध: समभवन्महान्॥ ८॥
अनुवाद
यवक्रीत का यह कुकृत्य सुनते ही रैभ्य के हृदय में क्रोध की भयंकर अग्नि प्रज्वलित हो उठी, जो मानो उसके अन्तःकरण को भस्म कर रही थी ॥8॥
As soon as he heard this misdeed of Yavakrit, a fierce fire of anger ignited in Raibhya's heart, which seemed to be incinerating his conscience. 8॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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