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श्री महाभारत
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पर्व 3: वन पर्व
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अध्याय 135: कर्दमिलक्षेत्र आदि तीर्थोंकी महिमा, रैभ्य एवं भरद्वाजपुत्र यवक्रीत मुनिकी कथा तथा ऋषियोंका अनिष्ट करनेके कारण मेधावीकी मृत्यु
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श्लोक 5
श्लोक
3.135.5
एते कनखला राजन्नृषीणां दयिता नगा:।
एषा प्रकाशते गङ्गा युधिष्ठिर महानदी॥ ५॥
अनुवाद
युधिष्ठिर! ये कनखलकी पर्वतमालाएँ हैं जो ऋषियों को अत्यंत प्रिय हैं। ये महानदी गंगाजी शोभायमान हैं॥5॥
Yudhishthira! These are the Kankhalki mountain ranges which are very dear to the sages. This great river Ganga is looking beautiful. ॥5॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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