श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 135: कर्दमिलक्षेत्र आदि तीर्थोंकी महिमा, रैभ्य एवं भरद्वाजपुत्र यवक्रीत मुनिकी कथा तथा ऋषियोंका अनिष्ट करनेके कारण मेधावीकी मृत्यु  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  3.135.22 
इन्द्र उवाच
अमार्ग एष विप्रर्षे येन त्वं यातुमिच्छसि।
किं विघातेन ते विप्र गच्छाधीहि गुरोर्मुखात्॥ २२॥
 
 
अनुवाद
इन्द्र ने कहा - विप्रर्षे ! तुम जिस मार्ग पर चलना चाहते हो, वह विद्याध्ययन का मार्ग नहीं है । स्वाध्याय के उचित मार्ग को नष्ट करके तुम्हें क्या लाभ होगा ? अतः तुम गुरु के मुख से ही विद्याध्ययन करो । 22॥
 
Indra said – Viprarshe! The path you want to take is not the path of study. What benefit will you gain by destroying the proper path of self-study? Therefore, go and study from the mouth of the Guru only. 22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)