यो वै दर्पात् संहननोपपन्न:
सुदुर्बल: पर्वतमाविहन्ति।
तस्यैव पाणि: सनखो विदीर्यते
न चैव शैलस्य हि दृश्यते व्रण:॥ ४॥
अनुवाद
जो मनुष्य शरीर से अत्यन्त दुर्बल होते हुए भी अहंकार के कारण पर्वत पर हाथ से प्रहार करता है, उसके हाथ और नख फट जाते हैं। उस प्रहार से पर्वत घायल होता हुआ नहीं देखा जाता। ॥4॥
The person who despite being very weak in body, hits the mountain with his hands due to ego, his hands and nails get torn. The mountain is not seen to be wounded by that hit. ॥ 4॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥