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mahabharat 3.134.36: राजा जनक के इस यज्ञ में उत्तम, महत्त्वपूर्ण और उपयुक्त स्तोत्र गाया जा रहा है, सोमरस का विधिपूर्वक सेवन किया जा रहा है, देवतागण प्रत्यक्ष दर्शन देकर बड़े हर्ष से अपना पवित्र भाग ग्रहण कर रहे हैं ॥ 36॥   |   mahabharat अध्याय 3.134: बन्दी और अष्टावक्रका शास्त्रार्थ, बन्दीकी पराजय तथा समङ्गामें स्नानसे अष्टावक्रके अंगोंका सीधा होना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 134: बन्दी और अष्टावक्रका शास्त्रार्थ, बन्दीकी पराजय तथा समङ्गामें स्नानसे अष्टावक्रके अंगोंका सीधा होना  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  3.134.36 
महदौक्थ्यं गीयते साम चाग्रॺं
सम्यक् सोम: पीयते चात्र सत्रे।
शुचीन् भगान् प्रतिजगृहुश्च हृष्टा:
साक्षाद् देवा जनकस्योत राज्ञ:॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
राजा जनक के इस यज्ञ में उत्तम, महत्त्वपूर्ण और उपयुक्त स्तोत्र गाया जा रहा है, सोमरस का विधिपूर्वक सेवन किया जा रहा है, देवतागण प्रत्यक्ष दर्शन देकर बड़े हर्ष से अपना पवित्र भाग ग्रहण कर रहे हैं ॥ 36॥
 
In this sacrifice of King Janaka, the excellent, important and appropriate hymn is being sung, the Soma juice is being consumed in a proper manner, the gods, after giving darshan directly, are taking their sacred shares with great joy. ॥ 36॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)