श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 134: बन्दी और अष्टावक्रका शास्त्रार्थ, बन्दीकी पराजय तथा समङ्गामें स्नानसे अष्टावक्रके अंगोंका सीधा होना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.134.1 
अष्टावक्र उवाच
अत्रोग्रसेन समितेषु राजन्
समागतेष्वप्रतिमेषु राजसु।
नावैमि बन्दिं वरमत्र वादिनां
महाजले हंसमिवाददामि॥ १॥
 
 
अनुवाद
अष्टावक्र बोले - हे राजा जनक! अपनी भयंकर सेनाओं के साथ इस सभा में सब ओर से अतुलनीय पराक्रमी राजा एकत्रित हुए हैं; किन्तु मैं उनमें से प्रधान बन्दी को पहचानने में असमर्थ हूँ। यदि मैं उसे पहचान लूँ, तो उसे गहरे जल में छिपे हुए हंस की भाँति अवश्य पकड़ लूँगा॥1॥
 
Ashtavakra said - O King Janaka, with his fearsome armies! In this assembly, incomparably powerful kings from all sides have gathered; but I am unable to identify the chief prisoner among them. If I identify him, I will certainly catch him like a swan in the deep water.॥ 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)