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श्लोक 3.132.9  |
तं वै विप्र: पर्यचरत् सशिष्य-
स्तां च ज्ञात्वा परिचर्यां गुरु: स:।
तस्मै प्रादात् सद्य एव श्रुतं च
भार्यां च वै दुहितरं स्वां सुजाताम्॥ ९॥ |
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| अनुवाद |
| ब्राह्मण 'कहोड़' एक विनम्र शिष्य की भाँति उद्दालक ऋषि की सेवा किया करते थे। अपने शिष्य की सेवा का महत्त्व समझकर गुरु ने शीघ्र ही उन्हें समस्त वेद-शास्त्रों की शिक्षा दी तथा अपनी पुत्री सुजाता को भी पत्नी के रूप में प्रदान किया।॥9॥ |
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| Brahmin 'Kahoda' used to serve the sage Uddalak like a humble disciple. Realising the importance of his disciple's service, the Guru soon taught him all the Vedas and scriptures and also gave him his daughter Sujata as his wife.॥9॥ |
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