श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 132: अष्टावक्रके जन्मका वृत्तान्त और उनका राजा जनकके दरबारमें जाना  »  श्लोक 5-6
 
 
श्लोक  3.132.5-6 
उपास्स्व कौन्तेय सहानुजस्त्वं
तस्याश्रमं पुण्यतमं प्रविश्य।
अष्टावक्रं यस्य दौहित्रमाहु-
र्योऽसौ बन्दिं जनकस्याथ यज्ञे॥ ५॥
वादी विप्राग्रॺो बाल एवाभिगम्य
वादे भङ्‍‍क्‍त्‍वा मज्जयामास नद्याम्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
कुन्तीपुत्र! महाब्राह्मण अष्टावक्र शास्त्रार्थ में अत्यन्त कुशल थे। बाल्यकाल में ही उन्होंने राजा जनक की यज्ञवेदी पर आकर उनके शत्रु बंदी को परास्त करके नदी में फेंक दिया था। यह महर्षि अष्टावक्र का परम पवित्र आश्रम है, जो महापुरुष उद्दालक के पौत्र कहे जाते हैं। तुम अपने भाइयों सहित इसमें प्रवेश करो और कुछ समय तक ईश्वर का ध्यान करो। ॥5-6॥
 
Kunti's son! The great Brahmin Ashtavakra was very skilled in debates. In his childhood itself, he had come to the sacrificial altar of King Janaka and defeated his opponent Bandi and had him thrown into the river. This is the most sacred hermitage of the sage Ashtavakra, who is said to be the grandson of the great soul Uddalaka. Enter it along with your brothers and worship (contemplate on God) for some time. ॥ 5-6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)