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श्लोक 3.132.20-21  |
तत: सुजाता परमार्तरूपा
शापाद् भीता सर्वमेवाचचक्षे।
तद् वै तत्त्वं सर्वमाज्ञाय रात्रा-
वित्यब्रवीच्छ्वेतकेतुं स विप्र:॥ २०॥
गच्छाव यज्ञं जनकस्य राज्ञो
बह्वाश्चर्य: श्रूयते तस्य यज्ञ:।
श्रोष्यावोऽत्र ब्राह्मणानां विवाद-
मर्थं चाग्रॺं तत्र भोक्ष्यावहे च॥ २१॥ |
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| अनुवाद |
| बालक के इस प्रश्न से सुजाता को बहुत दुःख हुआ। शाप के भय से उसने उसे सारी बात बता दी। यह सारा रहस्य जानकर उन्होंने रात्रि में श्वेतकेतु से कहा, 'आओ हम दोनों राजा जनक के यज्ञ में चलें। सुना है कि उस यज्ञ में बड़ी आश्चर्यजनक बातें दिखाई देती हैं। हम दोनों वहाँ विद्वान ब्राह्मणों का शास्त्रार्थ सुनेंगे और वहीं स्वादिष्ट भोजन करेंगे।' |
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| Sujata was deeply pained by this question of the boy. Fearing the curse, she told him everything. Knowing all this secret, they told Shwetaketu at night, 'Let us both go to the yagya of King Janaka. It is heard that very surprising things are seen in that yagya. We both will listen to the debates of learned Brahmins there and will eat delicious food there. |
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