श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 129: कुरुक्षेत्रके द्वारभूत प्लक्षप्रस्रवण नामक यमुनातीर्थ एवं सरस्वतीतीर्थकी महिमा  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  3.129.12 
अत्रैव नाहुषो राजा राजन् क्रतुभिरिष्टवान्।
ययातिर्बहुरत्नौघैर्यत्रेन्द्रो मुदमभ्यगात्॥ १२॥
 
 
अनुवाद
राजन! यहीं पर नहुषनंदन राजा यया ने रत्नों और दक्षिणा से भरपूर अनेक यज्ञ किये थे। उन यज्ञों से इन्द्र अत्यंत प्रसन्न हुए थे। 12॥
 
Rajan! It was here that Nahushanandan King Yaya performed various yagyas with abundance of gems and dakshina. Indra was very happy in those yagyas. 12॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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