श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 129: कुरुक्षेत्रके द्वारभूत प्लक्षप्रस्रवण नामक यमुनातीर्थ एवं सरस्वतीतीर्थकी महिमा  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  3.129.10 
एकरात्रमुषित्वेह द्वितीयं यदि वत्स्यसि।
एतद् वै ते दिवावृत्तं रात्रौ वृत्तमतोऽन्यथा॥ १०॥
 
 
अनुवाद
(ठीक है, यदि आए हो तो एक रात ठहरो,) यदि एक रात यहाँ रहकर दूसरी रात भी ठहरोगे तो दिन में तो तुम्हारी यह दशा होगी (आज दिन में तुम्हें यह कष्ट दिया गया है) और रात्रि में तुम्हारे साथ दूसरा व्यवहार किया जाएगा (तुम्हें विशेष कष्ट दिया जाएगा)॥10॥
 
(Okay, if you have come then stay for one night,) If after staying here for one night you stay for the second night as well then this is your condition during the day (today you have been given this trouble during the day) and at night you will be treated differently (you will be given special trouble)’॥ 10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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