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श्लोक 3.127.21  |
तस्यामेव तु ते जन्तुर्भविता पुनरात्मज:।
उत्तरे चास्य सौवर्णं लक्ष्म पार्श्वे भविष्यति॥ २१॥ |
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| अनुवाद |
| तेरा पुत्र अपनी माता के गर्भ से फिर जन्म लेगा, और उस समय उसकी बायीं पसली पर एक सुनहरा चिन्ह होगा। 21. |
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| Your son will be born again from his mother's womb. At that time, there will be a golden mark on his left rib. 21. |
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इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां जन्तूपाख्याने सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १२७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें जन्तूपाख्यानविषयक एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १२७॥
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