श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 127: सोमक और जन्तुका उपाख्यान  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.127.17 
ऋत्विगुवाच
अस्ति चैतादृशं कर्म येन पुत्रशतं भवेत्।
यदि शक्नोषि तत् कर्तुमथ वक्ष्यामि सोमक॥ १७॥
 
 
अनुवाद
पुजारी ने कहा, "सोमक, एक ऐसा कार्य है जिससे तुम्हें सौ पुत्र प्राप्त हो सकते हैं। यदि तुम ऐसा कर सको, तो मैं तुम्हें बताऊँगा।"
 
The priest said, "Somaka, there is a deed by which you can have a hundred sons. If you can do it, I will tell you."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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