श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 122: महर्षि च्यवनको सुकन्याकी प्राप्ति  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  3.122.29 
अग्नीनामतिथीनां च शुश्रूषुरनसूयिका।
समाराधयत क्षिप्रं च्यवनं सा शुभानना॥ २९॥
 
 
अनुवाद
तेजस्वी सुकन्या किसी के गुणों में कोई दोष नहीं देखती थी। वह त्रिविध अग्नि और अतिथियों की सेवा में तत्पर रहती थी और शीघ्र ही महर्षि च्यवन की पूजा करने लगी। 29॥
 
The bright Sukanya did not see any faults in anyone's qualities. She was ready to serve the threefold fire and the guests and soon started worshiping Maharishi Chyavan. 29॥
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां सौकन्ये द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १२२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें सुकन्योपाख्यानविषयक एक सौ बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १२२॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)