श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 122: महर्षि च्यवनको सुकन्याकी प्राप्ति  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  3.122.28 
सुकन्यापि पतिं लब्ध्वा तपस्विनमनिन्दिता।
नित्यं पर्यचरत् प्रीत्या तपसा नियमेन च॥ २८॥
 
 
अनुवाद
तपस्वी च्यवन को पतिरूप में पाकर सुकन्या भी प्रतिदिन प्रेमपूर्वक उनकी सेवा करने लगी, तप और नियमों का पालन करने लगी॥ 28॥
 
Having found the ascetic Chyavana as her husband, Sukanya also began to serve him lovingly every day, observing the penance and rules.॥ 28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)