श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 120: सात्यकिके शौर्यपूर्ण उद्‍गार तथा युधिष्ठिरद्वारा श्रीकृष्णके वचनोंका अनुमोदन एवं पाण्डवोंका पयोष्णी नदीके तटपर निवास  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  3.120.7 
भ्राता च मे य: स सखा गुरुश्च
जनार्दनस्यात्मसमश्च पार्थ:।
यदर्थमैच्छन् मनुजा: सुपुत्रं
शिष्यं गुरुश्चाप्रतिकूलवादम्॥ ७॥
 
 
अनुवाद
कुंतीकुमार अर्जुन, जो मेरे भाई, मित्र और गुरु हैं, जो भगवान श्रीकृष्ण के समान आत्मीय हैं, वे भी पृथक् रहें। जिस उद्देश्य से मनुष्य उत्तम पुत्र और गुरु के विरुद्ध न बोलने वाले शिष्य की कामना करते हैं, वह पूर्ण होने का समय आ गया है। 7॥
 
Kuntikumar Arjun, who is my brother, friend and guru, who is a soulmate equal to Lord Krishna, should also remain separate. The time has come to fulfill the purpose for which humans wish for a good son and a disciple who does not speak against the Guru. 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)