श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 120: सात्यकिके शौर्यपूर्ण उद्‍गार तथा युधिष्ठिरद्वारा श्रीकृष्णके वचनोंका अनुमोदन एवं पाण्डवोंका पयोष्णी नदीके तटपर निवास  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  3.120.32 
सुतेन सोमेन विमिश्रतोयां
पय: पयोष्णीं प्रति सोऽध्युवास।
द्विजातिमुख्यैर्मुदितैर्महात्मा
संस्तूयमान: स्तुतिभिर्वराभि:॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
उस जल में यज्ञ का सोमरस मिला हुआ था। वह पयोष्णी नदी के तट पर गया और उसका जल पीकर वहीं रहने लगा। उस समय हर्ष में भरकर श्रेष्ठ ब्राह्मण उत्तम स्तोत्रों द्वारा उस महापुरुष की स्तुति कर रहे थे।
 
Its water had the Soma juice of sacrifice mixed in it. He went to the bank of Payoshni and drank its water and stayed there. At that time, the best Brahmins filled with joy were praising that great king with excellent hymns.
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां यादवगमने विंशत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १२०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राप्रसंगमें यादवगमनविषयक एक सौ बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १२०॥

 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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