श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 120: सात्यकिके शौर्यपूर्ण उद्‍गार तथा युधिष्ठिरद्वारा श्रीकृष्णके वचनोंका अनुमोदन एवं पाण्डवोंका पयोष्णी नदीके तटपर निवास  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  3.120.23 
वासुदेव उवाच
असंशयं माधव सत्यमेतद्
गृह्णीम ते वाक्यमदीनसत्त्व।
स्वाभ्यां भुजाभ्यामजितां तु भूमिं
नेच्छेत् कुरूणामृषभ: कथंचित्॥ २३॥
 
 
अनुवाद
भगवान श्रीकृष्ण बोले, "उदार हृदय वाले मधुकुल रत्न सत्यके! तुम जो कह रहे हो वह सत्य है, इसमें संशय नहीं है। हम तुम्हारे वचन स्वीकार करते हैं; किन्तु ये कौरवश्रेष्ठ युधिष्ठिर किसी भी प्रकार से ऐसी भूमि नहीं लेना चाहते, जिसे उन्होंने अपने शस्त्रों से न जीता हो।"
 
Lord Krishna said, "Generous-hearted Satyake, the jewel of the Madhukul! What you are saying is true, there is no doubt about it. We accept your words; but this best of the Kurus, Yudhishthira, would not like to take any land in any way, which he has not won with his own arms." 23.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)