श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 120: सात्यकिके शौर्यपूर्ण उद्‍गार तथा युधिष्ठिरद्वारा श्रीकृष्णके वचनोंका अनुमोदन एवं पाण्डवोंका पयोष्णी नदीके तटपर निवास  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  3.120.13 
न विद्यते जाम्बवतीसुतस्य
रणे विषह्यं हि रणोत्कटस्य।
एतेन बालेन हि शम्बरस्य
दैत्यस्य सैन्यं सहसा प्रणुन्नम्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
जाम्बवतीनन्दन साम्ब युद्धभूमि में अत्यन्त वीर हो जाते हैं। उस समय उनके लिए कुछ भी असह्य नहीं होता। उन्होंने बाल्यकाल में ही शम्बरासुर की सेना का अचानक संहार कर दिया था ॥13॥
 
Jambavatinandan Samba becomes very brave in the battlefield. At that time nothing is unbearable for them. He had suddenly destroyed Shambarasura's army in his childhood itself. 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)