श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 120: सात्यकिके शौर्यपूर्ण उद्‍गार तथा युधिष्ठिरद्वारा श्रीकृष्णके वचनोंका अनुमोदन एवं पाण्डवोंका पयोष्णी नदीके तटपर निवास  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  3.120.11 
निघ्नन्तमेकं कुरुयोधमुख्या-
नग्निं महाकक्षमिवान्तकाले।
प्रद्युम्नमुक्तान्निशितान्न शक्ता:
सोढुं कृपद्रोणविकर्णकर्णा:॥ ११॥
 
 
अनुवाद
जैसे प्रलय की अग्नि सूखी घास के ढेर को जलाकर राख कर देती है, वैसे ही मैं अकेला ही कौरव सेना के प्रधान योद्धाओं का नाश कर दूँगा और सब लोग मुझे ऐसा करते देखेंगे। कृपाचार्य, द्रोणाचार्य, विकर्ण और कर्ण - इनमें से किसी में भी प्रद्युम्न के छोड़े हुए तीखे बाणों का सामना करने की शक्ति नहीं है ॥ 11॥
 
Just as the fire of destruction burns a pile of dry grass to ashes, similarly I alone will destroy the chief warriors of the Kaurava army and everyone will see me doing so. Kripacharya, Dronacharya, Vikarna and Karna - none of them have the strength to withstand the sharp arrows shot by Pradyumna. ॥ 11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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