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mahabharat 3.12.65: श्री कृष्ण! मैं धर्म से भीष्म और धृतराष्ट्र दोनों की पुत्रवधू हूँ, फिर भी उनके सामने मुझे बलपूर्वक दासी बनाया गया ॥65॥   |   mahabharat अध्याय 3.12: अर्जुन और द्रौपदीके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति, द्रौपदीका भगवान् श्रीकृष्णसे अपने प्रति किये गये अपमान और दु:खका वर्णन और भगवान् श्रीकृष्ण, अर्जुन एवं धृष्टद्युम्नका उसे आश्वासन देना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 12: अर्जुन और द्रौपदीके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति, द्रौपदीका भगवान् श्रीकृष्णसे अपने प्रति किये गये अपमान और दु:खका वर्णन और भगवान् श्रीकृष्ण, अर्जुन एवं धृष्टद्युम्नका उसे आश्वासन देना  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  3.12.65 
नन्वहं कृष्ण भीष्मस्य धृतराष्ट्रस्य चोभयो:।
स्नुषा भवामि धर्मेण साहं दासीकृता बलात्॥ ६५॥
 
 
अनुवाद
श्री कृष्ण! मैं धर्म से भीष्म और धृतराष्ट्र दोनों की पुत्रवधू हूँ, फिर भी उनके सामने मुझे बलपूर्वक दासी बनाया गया ॥65॥
 
Sri Krishna! I am the daughter-in-law of both Bhishma and Dhritarashtra by religion, yet I was forcefully made a slave in front of them. 65॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)