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mahabharat 3.12.117: तथापि आज इतना सब होते हुए भी मैं अनेक प्रकार के कष्ट सह रहा हूँ और महान दुःख में डूबा हुआ अपनी सास कुन्ती से अलग होकर धौम्य को अपने सामने रखकर वन में रह रहा हूँ।   |   mahabharat अध्याय 3.12: अर्जुन और द्रौपदीके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति, द्रौपदीका भगवान् श्रीकृष्णसे अपने प्रति किये गये अपमान और दु:खका वर्णन और भगवान् श्रीकृष्ण, अर्जुन एवं धृष्टद्युम्नका उसे आश्वासन देना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 12: अर्जुन और द्रौपदीके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति, द्रौपदीका भगवान् श्रीकृष्णसे अपने प्रति किये गये अपमान और दु:खका वर्णन और भगवान् श्रीकृष्ण, अर्जुन एवं धृष्टद्युम्नका उसे आश्वासन देना  »  श्लोक 117
 
 
श्लोक  3.12.117 
एवं क्लेशै: सुबहुभि: क्लिश्यमाना सुदु:खिता।
निवसाम्यार्यया हीना कृष्ण धौम्यपुर:सरा॥ ११७॥
 
 
अनुवाद
तथापि आज इतना सब होते हुए भी मैं अनेक प्रकार के कष्ट सह रहा हूँ और महान दुःख में डूबा हुआ अपनी सास कुन्ती से अलग होकर धौम्य को अपने सामने रखकर वन में रह रहा हूँ।
 
However, today, in spite of all this, I am suffering many kinds of pain and being immersed in great sorrow, I have separated from my mother-in-law Kunti and am living in the forest with Dhoumya in front of me.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)