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श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 12: अर्जुन और द्रौपदीके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति, द्रौपदीका भगवान् श्रीकृष्णसे अपने प्रति किये गये अपमान और दु:खका वर्णन और भगवान् श्रीकृष्ण, अर्जुन एवं धृष्टद्युम्नका उसे आश्वासन देना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.12.1 
वैशम्पायन उवाच
भोजा: प्रव्रजिताञ्छ्रुत्वा वृष्णयश्चान्धकै: सह।
पाण्डवान् दु:खसंतप्तान् समाजग्मुर्महावने॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं: हे जनमेजय! जब भोज, वृष्णि और अंधक वंश के वीरों ने सुना कि पाण्डव अत्यन्त दुःखी होकर राजधानी से चले गये हैं, तब वे उनसे मिलने के लिए महान वन में गये।
 
Vaishmpayana says: O Janamejaya, when the heroes of Bhoja, Vrishni and the Andhaka clan heard that the Pandavas, greatly distressed, had left the capital, they went to the great forest to meet them.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)