श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 117: परशुरामजीका पिताके लिये विलाप और पृथ्वीको इक्‍कीस बार नि:क्षत्रिय करना एवं महाराज युधिष्ठिरके द्वारा परशुरामजीका पूजन  »  श्लोक 5-6
 
 
श्लोक  3.117.5-6 
विलप्यैवं सकरुणं बहु नानाविधं नृप।
प्रेतकार्याणि सर्वाणि पितुश्चक्रे महातपा:॥ ५॥
ददाह पितरं चाग्नौ राम: परपुरंजय:।
प्रतिजज्ञे वधं चापि सर्वक्षत्रस्य भारत॥ ६॥
 
 
अनुवाद
राजन! इस प्रकार अत्यंत करुणापूर्वक विलाप करके शत्रुओं की राजधानी को जीतने वाले महातपस्वी परशुरामजी ने अपने पिता का सम्पूर्ण अन्त्येष्टि संस्कार किया। पहले उन्होंने विधिपूर्वक अग्नि में अपने पिता का दाह संस्कार किया, फिर समस्त क्षत्रियों का संहार करने की प्रतिज्ञा की।
 
Rajan! In this way, the great ascetic Parashuramji, who conquered the enemies' capital by wailing with utmost compassion, performed all the last rites of his father. India First, he ritually cremated his father in the fire, then vowed to kill all the Kshatriyas. 5-6॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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