श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 117: परशुरामजीका पिताके लिये विलाप और पृथ्वीको इक्‍कीस बार नि:क्षत्रिय करना एवं महाराज युधिष्ठिरके द्वारा परशुरामजीका पूजन  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  3.117.2 
धर्मज्ञस्य कथं तात वर्तमानस्य सत्पथे।
मृत्युरेवंविधो युक्त: सर्वभूतेष्वनागस:॥ २॥
 
 
अनुवाद
पिता जी! आप धार्मिक विद्वान होने के साथ-साथ सन्मार्ग के अनुयायी भी थे। आपने कभी किसी जीव के प्रति कोई अपराध नहीं किया। फिर आपकी मृत्यु कैसे उचित ठहराई जा सकती है?॥ 2॥
 
Father! Besides being a religious scholar, you were also a follower of the right path. You never committed any crime against any living being. Then how can your death be justified?॥ 2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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