श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 117: परशुरामजीका पिताके लिये विलाप और पृथ्वीको इक्‍कीस बार नि:क्षत्रिय करना एवं महाराज युधिष्ठिरके द्वारा परशुरामजीका पूजन  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  3.117.18 
अर्चित्वा जामदग्न्यं स पूजितस्तेन चोदित:।
महेन्द्र उष्य तां रात्रिं प्रययौ दक्षिणामुख:॥ १८॥
 
 
अनुवाद
जमदग्निपुत्र परशुराम की पूजा करके और स्वयं उनके द्वारा सम्मानित होकर, उनकी आज्ञा से वे उस रात महेंद्र पर्वत पर ही रुके। फिर प्रातःकाल उठकर वे दक्षिण दिशा की ओर चल पड़े।
 
Having worshipped Parasurama, the son of Jamadagni, and being himself honoured by him, by his permission he stayed that night on the Mahendra mountain. Then getting up in the morning he proceeded towards the south.
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां कार्तवीर्योपाख्याने सप्तदशाधिकशततमोऽध्याय:॥ ११७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें कार्तवीर्योपाख्यानविषयक एक सौ सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ११७॥

 
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas