श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 117: परशुरामजीका पिताके लिये विलाप और पृथ्वीको इक्‍कीस बार नि:क्षत्रिय करना एवं महाराज युधिष्ठिरके द्वारा परशुरामजीका पूजन  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  3.117.16 
वैशम्पायन उवाच
ततश्चतुर्दशीं राम: समयेन महामना:।
दर्शयामास तान् विप्रान् धर्मराजं च सानुजम्॥ १६॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं: जनमेजय! तत्पश्चात चतुर्दशी के दिन नियत समय पर महामनस्वी परशुरामजी उस पर्वत पर रहने वाले ब्राह्मणों और बन्धुओं के साथ युधिष्ठिर के समक्ष प्रकट हुए।
 
Vaishmpayana says: Janamejaya! Thereafter, on the Chaturdashi day, at the appointed time, the great-minded Parashurama appeared before Yudhishthira along with the Brahmins and brothers who lived on that mountain.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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