श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 117: परशुरामजीका पिताके लिये विलाप और पृथ्वीको इक्‍कीस बार नि:क्षत्रिय करना एवं महाराज युधिष्ठिरके द्वारा परशुरामजीका पूजन  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  3.117.15 
एवं वैरमभूत् तस्य क्षत्रियैर्लोकवासिभि:।
पृथिवी चापि विजिता रामेणामिततेजसा॥ १५॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार सम्पूर्ण लोकों के क्षत्रियों से उनका द्वेष हो गया और उसी समय परम तेजस्वी परशुराम ने सम्पूर्ण पृथ्वी को जीत लिया था॥15॥
 
In this way he became hostile towards all the Kshatriyas of the entire world and at the same time the immensely illustrious Parasurama had conquered the entire earth.॥ 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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