श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 117: परशुरामजीका पिताके लिये विलाप और पृथ्वीको इक्‍कीस बार नि:क्षत्रिय करना एवं महाराज युधिष्ठिरके द्वारा परशुरामजीका पूजन  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  3.117.12 
वेदीं चाप्यददद्धैमीं कश्यपाय महात्मने।
दशव्यामायतां कृत्वा नवोत्सेधां विशाम्पते॥ १२॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर! उन्होंने महात्मा काश्यप को एक स्वर्ण वेदी भेंट की, जिसकी लंबाई-चौड़ाई दस-दस व्यास (चालीस-चालीस हाथ) थी। ऊँचाई भी नौ व्यास (छत्तीस हाथ) थी।॥12॥
 
Yudhishthira! He presented a golden altar to Mahatma Kashyap, whose length and breadth were ten vyams (forty hands each). In height also that altar was nine vyams (thirty-six hands).॥12॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas