श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 115: अकृतव्रणके द्वारा युधिष्ठिरसे परशुरामजीके उपाख्यानके प्रसंगमें ऋचीक मुनिका गाधिकन्याके साथ विवाह और भृगुऋषिकी कृपासे जमदग्निकी उत्पत्तिका वर्णन  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  3.115.42 
तत: प्रसादयामास श्वशुरं सा पुन: पुन:।
न मे पुत्रो भवेदीदृक् कामं पौत्रो भवेदिति॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
तब सत्यवती ने पुनः बार-बार प्रार्थना करके अपने श्वसुर को प्रसन्न किया और कहा - 'प्रभो! मेरा पुत्र ऐसा न हो। चाहे पोता क्षत्रिय स्वभाव का ही क्यों न हो।' 42॥
 
Then Satyavati again pleased her father-in-law by praying again and again and said – 'Lord! My son should not be like this. Even if the grandson becomes of Kshatriya nature. 42॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)