श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 115: अकृतव्रणके द्वारा युधिष्ठिरसे परशुरामजीके उपाख्यानके प्रसंगमें ऋचीक मुनिका गाधिकन्याके साथ विवाह और भृगुऋषिकी कृपासे जमदग्निकी उत्पत्तिका वर्णन  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  3.115.35 
भृगुरुवाच
ऋतौ त्वं चैव माता च स्नाते पुंसवनाय वै।
आलिङ्गेतां पृथग् वृक्षौ साश्वत्थं त्वमुदुम्बरम्॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
भृगु जी बोले - पुत्री! रजस्वला होने पर स्नान करके पुत्र प्राप्ति के उद्देश्य से तुम और तुम्हारी माता दो अलग-अलग वृक्षों का आलिंगन करो। तुम्हारी माता पीपल के वृक्ष का और तुम गूलर के वृक्ष का आलिंगन करो। 35.
 
Bhrigu Ji said - Daughter-in-law! After taking bath during the menstrual period, you and your mother should embrace two different trees for the purpose of getting a son. Your mother should embrace the Peepal tree and you should embrace the Gular tree. 35.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)