श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 115: अकृतव्रणके द्वारा युधिष्ठिरसे परशुरामजीके उपाख्यानके प्रसंगमें ऋचीक मुनिका गाधिकन्याके साथ विवाह और भृगुऋषिकी कृपासे जमदग्निकी उत्पत्तिका वर्णन  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  3.115.32 
भार्यापती तमासीनं गुरुं सुरगणार्चितम्।
अर्चित्वा पर्युपासीनौ प्राञ्जली तस्थतुस्तदा॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
दोनों पति-पत्नी ने पवित्र आसन पर बैठे हुए पूज्य गुरु (पिता-ससुर) की पूजा की और हाथ जोड़कर उनकी पूजा में तत्पर खड़े हो गए ॥32॥
 
Both the husband and wife worshiped the revered Guru (father and father-in-law) seated on the sacred seat and stood with folded hands engaged in his worship. 32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)