श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 115: अकृतव्रणके द्वारा युधिष्ठिरसे परशुरामजीके उपाख्यानके प्रसंगमें ऋचीक मुनिका गाधिकन्याके साथ विवाह और भृगुऋषिकी कृपासे जमदग्निकी उत्पत्तिका वर्णन  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  3.115.30 
धर्मेण लब्ध्वा तां भार्यामृचीको द्विजसत्तम:।
यथाकामं यथाजोषं तया रेमे सुमध्यया॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
महाबली ऋचीक ने धर्मपूर्वक सत्यवती को पत्नी रूप में प्राप्त करके अपनी इच्छानुसार उस सुन्दरी का संग किया ॥30॥
 
The great Brahmin Richika, having obtained Satyavati as his wife in a righteous manner, enjoyed the company of that beautiful lady according to his desire. ॥ 30॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)