श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 114: युधिष्ठिरका कौशिकी, गंगासागर एवं वैतरणी नदी होते हुए महेन्द्रपर्वतपर गमन  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  3.114.18 
यस्मिन् यज्ञे हि भूर्दत्ता कश्यपाय महात्मने।
सपर्वतवनोद्देशा दक्षिणार्थे स्वयम्भुवा॥ १८॥
 
 
अनुवाद
उस यज्ञमें भगवान ब्रह्माने पर्वतों और वनक्षेत्रोंसहित यह सम्पूर्ण पृथ्वी महात्मा काश्यपको दक्षिणारूपमें दे दी थी ॥18॥
 
In that yagya, Lord Brahma had given this entire earth including mountains and forest areas to Mahatma Kashyap in the form of Dakshina. 18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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