श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 114: युधिष्ठिरका कौशिकी, गंगासागर एवं वैतरणी नदी होते हुए महेन्द्रपर्वतपर गमन  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  3.114.13 
वैशम्पायन उवाच
ततो वैतरणीं सर्वे पाण्डवा द्रौपदी तथा।
अवतीर्य महाभागास्तर्पयांचक्रिरे पितॄन्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन ! तत्पश्चात् सभी भाग्यशाली पाण्डव और द्रौपदी वैतरणी के जल में उतरे और अपने पितरों का तर्पण किया ॥13॥
 
Vaishampayanji says- Rajan! Thereafter, all the fortunate Pandavas and Draupadi descended into the waters of Vaitarani and offered prayers to their ancestors. 13॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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