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पर्व 3: वन पर्व
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अध्याय 114: युधिष्ठिरका कौशिकी, गंगासागर एवं वैतरणी नदी होते हुए महेन्द्रपर्वतपर गमन
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श्लोक 12
श्लोक
3.114.12
इमां गाथामत्र गायन्नप: स्पृशति यो नर:।
देवयानोऽस्य पन्थाश्च चक्षुषाभिप्रकाशते॥ १२॥
अनुवाद
जो कोई इस श्लोक का गान करते हुए वैतरणी के जल का स्पर्श करता है, उसकी दृष्टि में देवयान मार्ग प्रकट हो जाता है ॥12॥
Whoever touches the water of Vaitarni while singing this verse, the Devayana path becomes visible to his sight. ॥12॥
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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