श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 114: युधिष्ठिरका कौशिकी, गंगासागर एवं वैतरणी नदी होते हुए महेन्द्रपर्वतपर गमन  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  3.114.1-2 
वैशम्पायन उवाच
तत: प्रयात: कौशिक्या: पाण्डवो जनमेजय।
आनुपूर्व्येण सर्वाणि जगामायतनान्यथ॥ १॥
स सागरं समासाद्य गङ्गाया: संगमे नृप।
नदीशतानां पञ्चानां मध्ये चक्रे समाप्लवम्॥ २॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! तत्पश्चात् पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर ने कौशिकी नदी के तट पर स्थित समस्त तीर्थों और देवालयों का क्रमशः दर्शन किया। राजन! वे गंगासागरसंगमतीर्थ नामक स्थान पर समुद्र के तट पर पहुँचे और पाँच सौ नदियों के जल में स्नान किया। 1-2॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! Thereafter, Pandunandan Yudhishthira visited all the pilgrimage sites and temples on the banks of Kaushiki river respectively. Rajan! He reached the sea shore at Gangasagarsangamatirtha and took bath in the waters of five hundred rivers. 1-2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)