श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 112: ऋष्यशृंगका पिताको अपनी चिन्ताका कारण बताते हुए ब्रह्मचारीरूपधारी वेश्याके स्वरूप और आचरणका वर्णन  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  3.112.2 
समृद्धरूप: सवितेव दीप्त:
सुश्लक्ष्णकृष्णाक्षिरतीव गौर:।
नील: प्रसन्नाश्च जटा: सुगन्धा
हिरण्यरज्जुग्रथिता: सुदीर्घा:॥ २॥
 
 
अनुवाद
उनका रूप अत्यंत सुंदर था। वे सूर्यदेव के समान चमक रहे थे। उनकी आँखें स्वच्छ, चिकनी और काली थीं। वे अत्यंत गोरे लग रहे थे। उनकी जटाएँ बहुत लंबी, स्वच्छ और नीले रंग की थीं। उनसे अत्यंत मधुर सुगंध आ रही थी। वे सभी जटाएँ सोने की रस्सी से बुनी हुई थीं॥2॥
 
His appearance was very beautiful. He was shining like the Sun God. His eyes were clean, smooth and black. He looked very fair. His matted locks were very long, clean and blue in colour. A very sweet smell was emanating from them. All those matted locks were woven with a golden rope.॥2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)