श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 110: नन्दा तथा कौशिकीका माहात्म्य, ऋष्यशृंग मुनिका उपाख्यान और उनको अपने राज्यमें लानेके लिये राजा लोमपादका प्रयत्न  »  श्लोक 23-24
 
 
श्लोक  3.110.23-24 
आश्रमश्चैव पुण्याख्य: काश्यपस्य महात्मन:।
ऋष्यशृङ्ग: सुतो यस्य तपस्वी संयतेन्द्रिय:॥ २३॥
तपसो य: प्रभावेण वर्षयामास वासवम्।
अनावृष्टॺां भयाद् यस्य ववर्ष बलवृत्रहा॥ २४॥
 
 
अनुवाद
यहाँ कश्यपगोत्री महात्मा विभाण्डक का 'पुण्य' नामक आश्रम है। इनके तपस्वी एवं जितेन्द्रिय पुत्र महात्मा ऋष्यश्रृंग हैं, जिन्होंने अपनी तपस्या के प्रभाव से इन्द्र से वर्षा कराई थी। उन दिनों देश में भयंकर सूखा पड़ा था; उस समय ऋष्यश्रृंग के भय से वृत्रासुर का संहार करने वाले तथा भगवान इन्द्र ने उस देश पर वर्षा की थी। 23-24॥
 
Here is the ashram named 'Punya' of Kashyapagotri Mahatma Vibhandaka. His ascetic and Jitendriya son is Mahatma Rishyashringa, who caused rain from Indra with the effect of his penance. In those days, there was severe drought in the country; at that time, due to the fear of Rishya Shringa, Lord Indra, the destroyer of Vritrasur and Lord Indra, had rained on that country. 23-24॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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