श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 107: सगरके पुत्रोंकी उत्पत्ति, साठ हजार सगरपुत्रोंका कपिलकी क्रोधाग्निसे भस्म होना, असमञ्जसका परित्याग, अंशुमान‍्के प्रयत्नसे सगरके यज्ञकी पूर्ति, अंशुमान‍्से दिलीपको और दिलीपसे भगीरथको राज्यकी प्राप्ति  »  श्लोक d5h-57
 
 
श्लोक  3.107.d5h-57 
तव चैव प्रभावेण स्वर्गं यास्यन्ति सागरा:।
(शलभत्वं गता ह्येते मम क्रोधहुताशने।)
पौत्रश्च ते त्रिपथगां त्रिदिवादानयिष्यति॥ ५६॥
पावनार्थं सागराणां तोषयित्वा महेश्वरम्।
हयं नयस्व भद्रं ते यज्ञियं नरपुङ्गव॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
'तुम्हारे प्रभाव से मेरे क्रोध की अग्नि में पतंगों की तरह जलकर भस्म हुए सगर के सभी पुत्र स्वर्ग को जाएँगे। तुम्हारा पौत्र भगवान शंकर को प्रसन्न करेगा और सगर के पुत्रों को पवित्र करने के लिए स्वर्ग से गंगाजी को यहाँ ले आएगा। हे नरश्रेष्ठ! तुम कल्याण करो। तुम इस यज्ञीय अश्व को ले जाओ। 56-57॥
 
'With your influence, all the sons of Sagar, who have been burnt like moths in the fire of my anger, will go to heaven. Your grandson will satisfy Lord Shankar and bring Gangaji here from heaven to purify the sons of Sagar. Male best! do you good. You take this sacrificial horse. 56-57॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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