श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 107: सगरके पुत्रोंकी उत्पत्ति, साठ हजार सगरपुत्रोंका कपिलकी क्रोधाग्निसे भस्म होना, असमञ्जसका परित्याग, अंशुमान‍्के प्रयत्नसे सगरके यज्ञकी पूर्ति, अंशुमान‍्से दिलीपको और दिलीपसे भगीरथको राज्यकी प्राप्ति  »  श्लोक 68-d6h
 
 
श्लोक  3.107.68-d6h 
न चावतारयामास चेष्टमानो यथाबलम्।
तस्य पुत्र: समभवच्छ्रीमान् धर्मपरायण:॥ ६८॥
भगीरथ इति ख्यात: सत्यवागनसूयक:।
अभिषिच्य तु तं राज्ये दिलीपो वनमाश्रित:॥ ६९॥
(भगीरथं महात्मानं सत्यधर्मपरायणम्।)
 
 
अनुवाद
वे यथाशक्ति प्रयत्न करने पर भी गंगा को पृथ्वी पर न ला सके। दिलीप के भगीरथ नाम के एक यशस्वी पुत्र हुए जो अत्यंत तेजस्वी, धर्मात्मा, सत्यवादी और निष्कलंक थे। सत्यनिष्ठ महात्मा भगीरथ का राज्याभिषेक करके दिलीप वन को चले गए। 68-69॥
 
Despite trying as much as they could, they could not bring Ganga down to earth. Dilip had a famous son named Bhagiratha who was extremely radiant, devout, truthful and blameless. Dilip went to the forest after coronating the true-hearted Mahatma Bhagiratha. 68-69॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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