श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 107: सगरके पुत्रोंकी उत्पत्ति, साठ हजार सगरपुत्रोंका कपिलकी क्रोधाग्निसे भस्म होना, असमञ्जसका परित्याग, अंशुमान‍्के प्रयत्नसे सगरके यज्ञकी पूर्ति, अंशुमान‍्से दिलीपको और दिलीपसे भगीरथको राज्यकी प्राप्ति  »  श्लोक 62
 
 
श्लोक  3.107.62 
अंशुमन्तं च सम्पूज्य समापयत तं क्रतुम्।
समाप्तयज्ञ: सगरो देवै: सर्वै: सभाजित:॥ ६२॥
 
 
अनुवाद
और अंशुमान की स्तुति करते हुए उन्होंने अपना यज्ञ पूर्ण किया। यज्ञ समाप्त होने पर सभी देवताओं ने सगर का बहुत सम्मान किया। 62.
 
And while praising Anshuman he completed his yajna. After the yajna was over all the gods honoured Sagara greatly. 62.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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